Monday, 10 April 2017

Narayn Shyam

महान सिंधी कवि
नारायण श्याम

आज 22 जुलाई को महान सिंधी कवि नारायण श्याम का जन्म दिवस है।
बीसवीं सदी के अज़ीम सिंधी शायर सदा-हयात नारायण श्यामको याद करना और उन पर बात करना दो वजहों से जरूरी है। पहला तो य कि वे जिस सिंधी बोली के शायर हैं,  वह आज अपने वजूद को बचाने के लिये जद्दोजहद कर रही है,  क्योंकि वे खुुद ही लिख गये हैं कि-
ऐसा न हो कि कल, ये किताबों में हम पढ़ें
थी एक सिंध, एक जबां सिंध वालों की भी थी!
और दूसरा  कि नारायण श्याम को समझना सिंधी कविता के विकास की यात्रा, और उस पर आजादी के बाद हुये बँटवारे और सिंधियों के विस्थापन के असर कीे पड़ताल करना भी है।
नारायण श्याम का जन्म 22 जुलाई 1922 को नौशहर सिंध पाकिस्तान (तब अविभाजित भारत) में हुआ था। विभाजन के बाद नारायण श्याम भारत आकर दिल्ली में बस गए, जहां उन्होंने पोस्ट एंड टेलीग्राफ विभाग के अकाउंट सेक्शन में बतौर क्लर्क काम किया। अपने काम और एक बड़े परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए उन्होंने 1953 से 1986 तक 11 किताबें लिखीं।
उन्हें 1970 में उनकी किताब 'वारी अ भरियो पलांद' पर 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से नवाजा गया। 
उन्होंने 11 वर्षों के अथक परिश्रम से 'रूप माया'  नाम से एक महान खंड काव्य की रचना की। यह सानेट्स में रचित है जो काव्य रचना की बहुत मुश्किल विधा है ।
नारायण श्याम की शायरी की शुरूआत कराची के काॅलेज के दिनों से हुई। कराची के डी.जे. सिंध काॅलेज के शिवकुंज होस्टल में उनके साथ थे सिंधी के महान शायर 'शेख अयाज' जो ता जिंदगी उनके गहरे दोस्त रहे। शिवकुंज होस्टल तमाम छोटे-बड़े सिंधी शायरों का अड्डा था। यहाँ 'परसराम जिया'  जो नारायण श्याम के गुरू रहे, खीयलदास फानी और गोविंद माली जैसे स्थापित सिंधी शायरों की सोहबत मे युवक नारायण श्याम के भीतर के शायरी के पौधे को फलने-फूलने के लिये भरपूर खाद पानी मिला। यह 1940  के आसपास का वक्त था। ये दौर सिंधी में आधुनिक कविता का दौर था। पर सिंधी कविता इस मुकाम पर पहुँचने से पहले दो अहम पड़ाव पार कर के आई थी, जिसे समझना जरूरी है।
अंग्रेजों ने सिंध पर 1843 में कब्जा किया और 1853 में उन्होंने फारसी के जगह अरबी सिंधी को राजकाज की भाषा बना दिया। फारसी जो पिछले 600 सालों से सिंध की राजकाज की भाषा रही थी पर सिंधी अदब में उसकी जगह न थी। तब सिंधी कविता दोहों, सोरन, श्लोक, काफी जैसे पुराने सिंधी फार्म्स में ही कही जाती थी और अधिकांशतः सूफी रंग में रंगी भक्ति कविता थी। अंग्रेजों के फारसी हटाने के फैसले का सिंधी अदीबों पर अजीब और उल्टा असर हुआ। अचानक सभी ने फारसी फार्म जैसे गज़ल और रूबाई में कविता कहनी शुरू कर दी। सिंधी गज़लों का पहला दीवान शायर गुल मोहम्मद ने 1855 में लिखा। फिर तो लगभग सारा सिंधी साहित्य गज़ल और रुबाइयों में लिखा जाने लगा। इस दौर मेें सारा जोर गज़ल का मीटर निभाने पर था। खयाल को लेकर ज्यादा फिक्र न थी। शायरी के मजमून फारसी गज़ल की तरह, शराब-साकी, शम्मा-परवाना ही थे। यह दौर गुल स्कूल ऑफ सिंधी शायरीके नाम से जाना जाता है। यह दौर लगभग 50-60 साल तक चला।
फिर बीसवीं सदी की शुरूआत में शायर हैदरबख्श और आधुनिक सिंधी कविता के जनक किशनचंद खत्री बेवसने सिंधी कविता को शराब साकी से निकालकर आम लोगों की जिंदगी की मुश्किलों से जोड़ा।
'बेवस' ने वह जमीन तैयार की, जिस पर नारायण श्याम ने भारत में और शेख अयाज ने पाकिस्तान में आधुनिक सिंधी कविता की इमारत खड़ी की। नारायण श्याम पर बेवस का असर तो है पर वे उनसे और अपने समकालीन शायरों से आगे भी निकले क्योंकि वे न सिर्फ सिंधी कविता के पुराने रंग जैसे सूफी भक्ति काव्य और गुल स्कूल आफ सिंधी गज़ल का असर अपने साथ लेकर चले बल्कि आजादी के बाद भारत आने के बाद हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य के संस्कार भी उन्होंने खुले दिल दिमाग से अपनाये। वे अपने तरह से एक अनोखे सिंधी कवि हैं जिन्होंने अपनी कविता में हिंदी के शब्दों का इतनी खूबसूरती से प्रयोग किया है कि वे सिंधी के ही लगते हैं।
हिंदी कविता का एक असर यह भी है कि उनकी कविताओं के जैसा रोमांटिसिज्म सिंधी शायरी में कम ही देखने को मिलता है। एक नमूना देखिये उनकी कविता 'रूप- माया' जो मेनका के महर्षि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के प्रसंग पर श्रृंगार रस की कविता है-
बनती जैसे-जैसे कली फूल जिस तरह 
जज्बात उस तरह से उभरते हैं गीत के
विश्वामित्र के जीवन के सौन्दर्य को न देख पाने का अफसोस नारायाण श्याम की कलम से देखिये
फूल न देखे , बस नजरें थीं काँटों पर 
चाँद के दागों पर रहती थी, मेरी नजर 
हाय मेरी आँखो पे था किसका असर 
इस दुनिया को समझा मैने दुःख का घर।
नारायाण श्याम के रोमांटिसिज्म से कुदरत के नज़ारे देखिये
दिन भर तो तपती रही 
सिंधु अब कपड़े फैलाये
देकर सितारों को चुंबन
अलिंगन में ले रात ले आई
सिंधु नदी, सिंधी शायरी का प्रिय मजमून रही है, पर आम सिंधी कविता में वह पूजनीय माँ स्वरूप या जीवनदायिनी के रूप में  आती है।
यह नारायाण श्याम का हुनर और सलाहियत है कि उनकी सिंधु सितारों को चुंबन देकर रात को गले लगाती है।
ऐसा ही एक बेमिसाल प्रयोग उन्होंने सिंधु की धरती को लेकर किया है, जिसमें अपनी मातृभूमि को माँ या पिता के रूप में नहीं बल्कि नवब्याहता के रूप में याद किया है।
सिंध का नक्शा देख के अक्सर, लिखता हूं मैं मन का खयाल 
बैठे-बैठे जैसे वर को जैसे आ जाये दुल्हन का खयाल
आजादी के बाद सिंध से भारत आये लाखों सिंधियों की तरह नारायाण श्याम भी सिंध की धरती और सिंधु नदी को शिद्दत से याद करते थे ।
भारत की धरती को सम्मान देते हुये सिंधु को याद करने का उनका अनोखा अंदाज देखिये-
गंगा-जमना अमृत अमृत
पर सिंधु तो है माँ का दूध
नारायण श्याम पर कोई बात पाकिस्तानी सिंधी शायर शेख अयाज़ के जिक्र के बगैर पूरी नहीं हो सकती। शेख अयाज़ और नारायण श्याम की दोस्ती दो अदीबों की दोस्ती तो है ही, पर इस रिश्ते में उस दौर के पाकिस्तान के सिंधियों और भारत के हिन्दु सिंधियों के रिश्ते की खुशबू भी है। जब 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ तो शेख अयाज़ ने नारायण श्याम को संबोधित कर अपनी वह विवादास्पद नज़्म लिखी जिसके लिये उन्हें जेल जाना पड़ा
यह संग्राम!
सामने है नारायण श्याम!
कैसे मैं बंदूक उठाऊँ 
इस पर कैसे गोली चलाऊँ
जज्बा इक और तन इक जैसे
बोली एक वचन इक जैसे 
वो कविता की काक का राजा
पर मेरे रंग रंतौल भी वैसे
इल्म भी एक और यार एक जैसे 
सज धज दिल के तार एक जैसे
कैसे मैं बंदूक उठाऊँ 
इस पर कैसे गोली चलाऊँ !
कहते हैं जब नारायाण श्याम की मौत की खबर शेख अयाज़ को मिली तो वे तीन दिन बेसुध रहे। इसी दीवानगी के आलम में कभी अचानक रात को उन्हें होश आता तो उठकर नारायण श्याम पर शेर लिखने लग जाते। बाद में उनके ये शेर सुर नारायाण श्याम नाम से एक संग्रह के रूप में प्रकाशित हुए।
गंगा तुम्हारी राख बहा ले गई मगर 
सिंधु ने इंतज़ार में बांहें फैलायीं बहुत
अभी सब कुछ साँवरे अधूरा है
दिल नहीं करता कि अभी सिधारें दुनिया से
पर दिल के चाहने से क्या होता है। कई पूरे अधूरे काम छोड़कर 10 जनवरी 1990  को यह महान कवि हमसे बिछड़ गया। अपनी मौत के बारे में उन्होंने लिखा था-
मैं तो इक आवाज फिजा में
दूर कहीं गुम़ हो जाऊँगा
देखना मुझको आसमान में
तुमको नजर मैं फिर आऊंगा 
जब तक सिंधी बोली है नारायण श्याम सिंधी सोच और कविता में जिंदा रहेंगे। उनकी ही एक कविता है -
जाकर मैं पहुँचा हूं कहां पर
क्या करना है तुम्हे जानकर
हाँ ये पूछो मुझसे सफर में
गुजरा हूँ मैं किस रहगुजर में
सिंध को कोई नहीं छीन सकता सिंधियों से,
सिंधु सिंधियों में बसती है,
सिंध यहाँ भी है सिंध वहाँ भी  
-संजय वर्मा


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